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How to influence anybody

           HOW TO INFLUENCE ANYBODY                किसी को कैसे प्रभावित किया जाए नमस्कार दोस्तों स्वागत है आपका हमारे इस मोटिवेशन ब्लॉक के अंदर  दोस्तों उम्मीद करता हूं कि आपको हमारे मोटिवेशन चैनल पसंद आ रहा होगा आपको मैं वादा करता हूं कि बने रहिए हमारे साथ आपके लाइफ के अंदर आपने जो चीजें कभी सोची नहीं अभी देखी नहीं होगी उनके बारे में बहुत ही अच्छी अच्छी जानकारी देने में जा रहे हैं और आपको हमेशा प्रेरणात्मक सुविधाएं वह आपको बहुत ही अच्छा ज्ञान दिया जाएगा , देखिए हमारा एक कोटेशन है कि "सीखते रहो आगे बढ़ते रहो" !  दोस्तों अगर आपको भी जीवन में कुछ करना है आगे बढ़ना है तो आप भी सीखते रहिए हमारे इस ब्लॉग मोटिवेशनल ब्लॉग में। 1.)  Communication--   किसी भी आदमी को प्रभावित करने के लिए हम को जरूरत सबसे ज्यादा किसकी पड़ती है ? हमको जरूरत पड़ती है कम्युनिकेशन की। कॉम्युनिकेशन में वो पावर है जिसकी मदद से कोई भी इंसान आगे बढ़ सकता है, या अगर यू कहु की बिना कॉम्युनिकेशन के कोई इंसान आगे बढ़ ही नही स...

बिहारक एक छोटे से गांव से उभरा बॉलीवुड का अनोखा सितारा

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बिहारक एक छोटे से गांव से उभरा बॉलीवुड का अनोखा सितारा   बॉलीवुड की चकाचोंध ने हमेशा ही अनगिनत कलाकारों को अपनी ओर खींचा है लेकिन सफलता उन्ही को मिली है जिन्होंने अपने अथक परिश्रम और दृढ़ विश्वास के साथ इस ओर कदम बढ़ाया है। आज भारतीय फ़िल्म जगत में तेजी से उभरते अभिनेता पंकज त्रिपाठी ने अपनी लगन और विश्वास के बल पर अपनी एक खास जगह बनाई है। बिहार के एक छोटे से गांव गोपालगंज से इस कलाकार ने अपना सफर शुरू किया।  बचपन से ही गांव में ये नाटक आदि में गहरी रुचि लिया करते थे।  इसलिए घर वालो की इच्छा के विरुद्ध अभिनय को ही अपना लक्ष्य बनाया। हालांकि इन्होंने पटना स्थित Food & craft Institute से डिप्लोमा लेकर दो साल तक पटना के ही मौर्य होटल में नोकरी भी की।  लेकिन वे अभिनय के अपने जुनून को रोक नही सके और दिल्ली के NSD से अभिनय की यात्रा पर निकल पड़े। शुरुआती दौर में NSD के अंग्रेजी माहौल में इन्हें काफी तकलीफे भी हुई, लेकिन अभिनय में अपनी कुशलता के चलते इन्होंने अपनी एक अलग पहचान बनाई। इसी दौरान साल 2004 में इन्हें अपनी पहली फ़िल्म "run" के लिए मौका मिला। जिसमे ...

बेटे के सुनहरे भविष्य के लिए पिता ने चलाई 105 किलोमीटर साईकल , छूटने नही दिया पेपर

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  बेटे के सुनहरे भविष्य के लिए पिता ने चलाई 105 किलोमीटर साईकल , छूटने नही दिया पेपर  हर पिता का एक ही सपना होता है की उसका बेटा सफलताओं के हर कीर्तिमान को छू ले। वह हर मुसीबत में  एक आसमान की भांति उसकी हर सम्भव मदद के लिए तत्पर रहता है । पिता का एक ऐसा ही स्नेह देखने को मिला है मध्यप्रदेश के धार जिले के गांव बयडीपूरा में जहाँ पर 38 वर्षीय एक गरीब-अनपढ़ पिता जिसका नाम शोभाराम है वह अपने बेटे को 10वी बोर्ड की परीक्षा दिलाने के लिए 105 किलोमीटर दूर परीक्षा केंद्र तक सायकल पर बिठाकर ले गया। परीक्षा के तीन-चार दिन पहले शुरू किया था सफर- शोभाराम नाम के इस व्यक्ति ने अपने बेटे की परीक्षा तिथि से एक दिन पहले सोमवार को  करीब तीन-चार दिन के खाने पीने के सामान के साथ अपना सफर शुरू किया। सही वक्त पर मंगलवार सुबह धार जिले शहर में स्थित भोजकन्या विद्यालय में बने परीक्षा केंद्र पर अपने बेटे को परीक्षा देने के लिए पहुचा दिया। *सायकल के अलावा नही था कोई और साधन*  कोरोना महामारी के वजह से यातायात बन्द होने की वजह से परीक्षा केंद्र पर पहुचने काफी मुश्किल ...

*पैरों से दिव्यांग इस बच्चे ने 10 किलोमीटर तक पैदल चलकर अस्पताल को जुटाए 9 करोड़ रुपये*।

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*पैरों से दिव्यांग इस बच्चे ने 10 किलोमीटर तक पैदल चलकर अस्पताल को जुटाए 9 करोड़ रुपये*। कोरोना के आने से दुनिया पूरी तरह बदल चुकी है यह एक ऐसी महामारी है जिसने पूरी दुनिया को गुटने टेकने पर मजबूर कर दिया। ऐसा कोई भी क्षेत्र नही है जो इससे नकारात्मक रूप से प्रभावित न हुआ हो। लेकिन इस समस्या के दौर में भी कुछ लोग ऐसे थे,  जिन्होंने हर सम्भव प्रयासों से जितना हो सके उतना मदद करने की पूरी कोशिश की। मदद की इस सृंखला मे इंग्लैंड का 5 साल एक पैरों से दिव्यांग बच्चा भी शामिल था। जिसने 10 किलोमीटर पैदल चलकर अस्पताल के लिए करीब 9 करोड़ रुपये की धन की जुटाई है। एक न्यूज ऐजेंसी के अनुसार इस बच्चे का नाम टोनी हड़गेल है। आपको बता दे टोनी के पैरों में पहले से ही दिक्कत थी, जिसकी वजह दे वह चल नही पाता था। लेकिन इसके बावजूद इस 5 साल के बच्चे को कृत्रिम अंग लगाए गए, जिसके बाद वह थोड़ा सा चलने लगा था। टोनी की इस हालत का जिम्मेदार कोई और नही बल्कि उसके खुद के बायोलॉजिकल माता-पिता है। मात्र 41 दिन के टोनी को उसके माता-पिता ने इतना प्रताड़ित किया की उसके दोनों पैर जख्मी हो गए। हालांकि टोनी के...

कोरोना कि इस महामारी के बीच आपके बच्चे क्या कर रहे है ???

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 5वीं कक्षा के इन दो बच्चों ने अमेरिका के MIT में हेकथौन अवार्ड 2020 जीतकर दुनिया मे किया भारत का नाम रोशन। कोरोना महामारी की वजह से बन्द पड़े स्कूलों की वजह से एक तरफ बच्चे घर पर पढ़ाई कर रहे है तो कुछ बच्चे मौज - मस्ती में लगे हुए है । लेकिन देश मे दो बच्चे ऐसे है  जिन्होंने दुनिया मे भारत का नाम रोशन किया। मुंबई के दो बच्चे जो कक्षा 5 के छात्र है इन्होंने अमेरिका के मेसाचुसेट्स इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (MIT) में 12 से 19 जुलाई के बीच आयोजत एप इंवेंटर हेकाथौन 2020 में अवार्ड जीतकर भारत का नाम पूरी दुनिया मे रोशन किया। इन दो बच्चों का नाम आयुष शंकरन (आयु 10 वर्ष)और जशीथ नारंग (आयु 9 वर्ष ) है। दोनों बच्चे मुंबई में ही कक्षा 5 की पढ़ाई कर रहे है । इन कारण मिला अवार्ड--  दोनों बच्चों ने जलवायु परिवर्तन पर एक मोबाइल एप विकसित किया जिसका शीर्षक 'climate Catastrophe - earth in dearth' है। इस एप प्रतिस्पर्धा में इन्होंने पहला और चौथा स्थान हांसिल किया। इस प्रतियोगिता में जलवायु परिवर्तन, बेहतर संसाधन आवंटन, स्वास्थ्य देखभाल , सीखने और दूर से काम करने , गर...

होंसला को पंख देकर 60 से 90 साल की दादियां स्कूल जाकर पढ़ाई कर रही है।

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होंसला को पंख देकर 60 से 90 साल की दादियां स्कूल जाकर पढ़ाई कर रही है।   शिक्षा मानव जीवन की वह विरासत है जिसे कोई किसी से छीन नही सकता है । यह वह धन है जिसे यदि आप किसी से सांझा करते है तो वह कम नही होता , बल्कि और बढ़ जाता है। शिक्षा प्राप्त करने की कोई उम्र नही होती है, इसे आप जब चाहे तब ग्रहण कर सकते है। आज के इस बढ़ते युग मे आपको कम से कम अपना नाम लिखना ओर पढ़ना तो आना ही चाहिए। पढ़ने लिखने के इस जुनून ने उम्र को दरकिनार करते हुए महाराष्ट्र के ठाणे जिले के फंगाने गांव में स्थित एक ऐसा खास स्कूल है जहाँ पर दादियां पढ़ती है। आपको जानकर यह हैरानी होगी कि इन दादियों की उम्र 60 से 90 वर्ष है। यह देश का ऐसा पहला स्कूल है जहाँ पर काफी ज्यादा उम्र की महिलाओं को पढ़ाने का काम किया जा रहा है। गजर में पोते पोतियों के साथ करती है पढ़ाई । स्कूल में से घर आने के बाद सभी दादियां अपने पोते - पोतियों के साथ पढ़ाई करती है। यह दोनों आपस मे एक-दूसरे को पढ़ाते है और साथ ही साथ कविताएं भी सुनाते है। पढ़ाई का यह वक्त एक-दूसरे को कुछ न कुछ सिखाने में गुजारा जाता है।  ऐसे आया स्कूल खोलने का वि...

बाई होने के बावजूद ऐसी दी अपनी आत्मा कथा को उड़ान

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बाई होने के बावजूद ऐसी दी अपनी आत्मा कथा को उड़ान    कहते है मुश्किल हर किसी की ज़िंदगी मे आती है , कोई बिखर जाता है तो कोई निखर जाता है। जिस दिन हमारे मन मे आसमान को छूने का होंसला, हिम्मत और आत्मविश्वास आ जायेगा, उस दिन खुद को रोकना मुश्किल ही नही नामुमकिन होगा। एक ऐसी ही शख्सियत है कश्मीर की "बेबी हलदर", जिन्होंने हर मुसीबतों से लड़कर अपना नाम बनाया। बेबी हलदर का जन्म 1973 में कश्मीर के एक आर्मी परिवार में हुआ था। शुरुआती दिनों में उनके पिता घर ख़र्च के लिए पैसे भेजते थे, लेकिन बाद में उन्होंने पैसे भेजना बन्द कर दिया। जिसकी  वजह से बेबी के परिवार को आर्थिक संकट का सामना करना पड़ा। सेना की नोकरी से रिटायर होने के बाद उनके पिता ने घर आना ही छोड़ दिया, जिसके बाद उनकी मां काफी ज्यादा दुखी रहने लगी और ज़िन्दगी से थक हार कर एक दिन उनकी माँ भी उन्हें छोड़ कर चली गयी। जिसके बाद उनके पिता ने दूसरी शादी कर ली, उस दौरान कभी बेबी हलदर कभी अपनी नई मां, बड़ी बहन के ससुराल और कभी सपनी बुआ के यहाँ रहकर अपना गुज़ारा करती। और इस दरमियान मन ही मन अपनी माँ को याद करती। लेकिन तमाम कठिनाइय...