बाई होने के बावजूद ऐसी दी अपनी आत्मा कथा को उड़ान
बाई होने के बावजूद ऐसी दी अपनी आत्मा कथा को उड़ान
कहते है मुश्किल हर किसी की ज़िंदगी मे आती है , कोई बिखर जाता है तो कोई निखर जाता है। जिस दिन हमारे मन मे आसमान को छूने का होंसला, हिम्मत और आत्मविश्वास आ जायेगा, उस दिन खुद को रोकना मुश्किल ही नही नामुमकिन होगा। एक ऐसी ही शख्सियत है कश्मीर की "बेबी हलदर", जिन्होंने हर मुसीबतों से लड़कर अपना नाम बनाया।
बेबी हलदर का जन्म 1973 में कश्मीर के एक आर्मी परिवार में हुआ था। शुरुआती दिनों में उनके पिता घर ख़र्च के लिए पैसे भेजते थे, लेकिन बाद में उन्होंने पैसे भेजना बन्द कर दिया। जिसकी वजह से बेबी के परिवार को आर्थिक संकट का सामना करना पड़ा। सेना की नोकरी से रिटायर होने के बाद उनके पिता ने घर आना ही छोड़ दिया, जिसके बाद उनकी मां काफी ज्यादा दुखी रहने लगी और ज़िन्दगी से थक हार कर एक दिन उनकी माँ भी उन्हें छोड़ कर चली गयी। जिसके बाद उनके पिता ने दूसरी शादी कर ली, उस दौरान कभी बेबी हलदर कभी अपनी नई मां, बड़ी बहन के ससुराल और कभी सपनी बुआ के यहाँ रहकर अपना गुज़ारा करती। और इस दरमियान मन ही मन अपनी माँ को याद करती। लेकिन तमाम कठिनाइयों के बावजूद बेबी ने स्कूल जाना नही छोड़ा। कई बार वो बिना कुछ खाए ही स्कूल चली जाती।
लेकिन घर की हालात दिन प्रति दिन बद से बदतर होते जा रहे थे। ऐसे में मजबूरी में उन्होंने छटी कक्षा में अपनी पढ़ाई छोड़ दी।
बेबी हलदर के पिता ने उनकी शादी 12 साल की उम्र में 14 साल बड़े आदमी से करवा दी, उन्हें लगा शायद अब उनकी ज़िन्दगी में खुशियों ने दस्तक दी है, लेकिन शादी के कुछ ही दिनों बाद उनके पति ने उनके साथ बुरा बर्ताव करना शुरू कर दिया, वह उन्हें अक्सर मरता-पिटता ओर 13 साल की उम्र में उन्होंने एक बच्चे को जन्म दिया, लेकिन उसके बाद भी घर मे कलह जारी रहा। अक्सर बेबी और उनके पति के बीच लड़ाइयां होती, लेकिन बेबी चुपचाप इस तकलीफ को झेलती और फिर एक दिन अचानक उन्होंने प्रताड़ना भरी अपनी शादी की ज़िंदगी से बाहर आने का फैसला किया। 25 साल तक अपने पति की गलियां सुनने के बाद बेबी हलदर अपने पति को छोड़कर एक दिन अपने तीन बच्चों के साथ ट्रैन के टॉयलेट के पास बैठकर दिल्ली चली गईं।
दिल्ली आने के बाद उन्होंने ठान लिया कि जैसी जिंदगी मुझे बचपन में जीने को मिली, वैसे जिंदगी में अपने मासूम बच्चों को नहीं जीने दूंगी। लेकिन अनजान शहर में आकर काम खोजना इतना आसान नहीं होता है, दिल्ली आने के बाद काम की खोज में इधर-उधर भटकने लगी, फिर बड़ी मुश्किल से एक घर में ग्रहणी के रूप में काम करना शुरू किया। फिर कुछ दिनों बाद महान लेखक प्रेमचंद के पोते से उन्होंने मदद मांगी। फिर बेबी ने उनके घर काम करना शुरू किया। जब भी वह प्रबोध के घर पर काम करने जाती तो सेल्फ में रखी पुस्तकों को देखा करती थी। बंगाली पुस्तकों को खोलकर पड़ने लगती। फिर एक दिन पर बहुत जीवन के लिए कॉपी पेंसिल लेकर आए और बोले कि कुछ भी अपने बारे में लिखो।
पहले तो बेबी घबरा गई थी क्योंकि उन्होंने सिर्फ 7वी क्लास तक ही पढ़ाई करी थी, लेकिन जैसे ही किताब खोल कर वह पढ़ने बैठी तो उन्हें अलग ही विश्वास आ गया और अपने बारे में लिखना शुरू कर दिया, किताब लिखने में इतनी खो गई, कि मानो उन्हें समय का ही पता नहीं रहा ।
सब्जी काटते और खाना बनाते वक्त भी कॉपी बगल में पड़ी रहती और बीच में लिखना शुरु कर देती । रात में बच्चों को सुला देने के बाद देर रात तक किताब लिखने में लग जाती, किताब लिखने के दौरान मानो उनकी मन की बातें शब्दों का रूप में लेने लगती है और लिखने के साथ ही उनका मन भी हल्का होता।
जब प्रमोद कुमार ने उनकी फर्स्ट कॉपी पढी तो उनकी आंखों में आंसू आ गए और बेबी की उस किताब को उन्होंने हिंदी में अनुवाद किया । फिर इस किताब को उन्होंने दोस्तों और परिचितों को भेजी फिर तो देखो आप प्रशंसा की बारिश होना शुरू हो गई। प्रमोद कुमार के घर काम करते हुए उनकी जिंदगी में नया मोड़ आ गया। जिसके बाद प्रमोद कुमार ने किताब को प्रकाशन में छपने के लिए भेजा। बेबी ने अपनी पहली किताब को देखा तो उन्हें यकीन नहीं हुआ कि उन्होंने ना अच्छा, शानदार पिता है
2002 में उनकी पहली किताब "आलो अंधारी" नाम से प्रकाशित हुई, अब हर तरफ बेबी के नाम को लेकर चर्चा होनी शुरू हो गई। खासकर जब महिलाओं ने यह किताब पढ़ी तो उनकी आंखों से आंसू छलक गए। इसके बाद बेबी की किताब को "A life less Ordinary" के शीर्षक से प्रकाशित किया गया ।
बेबी पेरिस और हांगकांग जैसे देशों में टूर कर चुकी है और 24 भाषाओं में उनकी किताब ट्रांसलेट हो चुकी है। दुनिया के कई देशों में वह लिटरेचर फेस्टिवल अटेंड कर चुकी है
ऐसा कह सकते हैं कि बेबी का एक लेखिका के रूप में उनका दूसरा जन्म हुआ है। और उनकी लिखी हुई कहानी लोगों के दिलों को स्पर्श करती है। तूने अपनी बात को शब्दों में लिखकर काफी खुशी मिलती है । बेबी हलदर की कहानी हमारे लिए एक मिसाल है जिन्होंने लगातार बचपन में इतनी कठिनाइयों का सामना करने के बाद भी कभी जीवन में हार नहीं मानी।
THANKS FOR BEING WITH US
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