Motivational story of a girl

                   
                Motivational story of a girl


        मासूम बच्चे को खोने के बाद भारत की पहली महिला बनी डॉक्टर ।
     



आज के जमाने में  महिलाएं हर जगह अपना परचम लहरा रही है। लेकिन 18वीं शताब्दी में महिलाओं को घर से बाहर निकलना भी दुश्वार था।  मगर महाराष्ट्र की डॉक्टर आनंदी गोपाल जोशी एक ऐसी महिला थी, जिन्होंने रूढ़ीवादी परंपरा को तोड़ते हुए देश का नाम रोशन किया।


 9 साल की उम्र में हुई थी शादी

आनंदी गोपाल जोशी का जन्म महाराष्ट्र के पुणे में साल 1865 में हुआ था। उनका जन्म ऐसे दौर में हुआ था जब महिलाओं का शिक्षित होना एक सपना हुआ करता।  था  उस दौर में महिलाओं को अपनी बातें दूसरों के समक्ष रखने की भी अनुमति नहीं थी, ऐसे में आनंदी गोपाल को भी उनके परिवार ने शिक्षा से वंचित और कड़ी बंदिशों में रखा था , परिवार के द्वारा दबाव देने पर आनन्दी जोशी ने महज 9 साल की उम्र में अपने से 20 साल बड़े युवक गोपाल राव से शादी कर ली थी। आनंदी के पति उस समय कल्याण में पोस्टल क्लर्क थे।

 आनन्दी को नही था पढ़ाई से लगाव

ब्याह के वक्त आनंदी को अक्षरों का ज्ञान भी नहीं था, तब गोपाल ने उन्हें क, ख, ग, से पढ़ाना शुरू किया, हालांकि आनंदी के मायके और ससुराल वाले उनकी पढ़ाई के खिलाफ थे, मगर फिर भी बिना समाज की परवाह किए उन्होंने आनन्दी को पढ़ना शुरू किया । लेकिन नन्हीं सी आनंदी को पढ़ाई में कोई लगाव नहीं था लेकिन पति के गुस्सा करने और प्यार से समझाने पर पढ़ाई शुरू कर दी । गोपाल अपनी पत्नी आंधी को किताबें भी लाकर देते थे ताकि उन्हें पढ़ाई करने में दिक्कत ना हो

 10 दिनों में ही बच्चे की हुई थी मौत

गोपाल काम के सिलसिले में कुछ दिन के लिए शहर से बाहर चले गए थे और जब वापस लौटे तो देखा कि आनंदी  घर में खेल रही थी । अपनी पत्नी को खेलता देख गुस्से से तिलमिला उठे और पूछा तुम पढ़ क्यों नहीं रही हो, तब आनंदी ने बड़ी ही मासूमियत से जवाब दिया, जितनी किताबे थी सब पढ़ चुकी हु,  पढ़ाई के साथ ही उनका वैवाहिक जीवन भी आगे बढ़ रहा था और 14 साल की उम्र में आनंदी ने अपनी पहली संतान को जन्म दिया, लेकिन बीमारी से ग्रसित होने के कारण 10 दिनों में ही उस बच्चे की मृत्यु हो गई थी। इस घटना का उन्हें गहरा सदमा पहुंचा था,   और अपनी संतान को खोने पर उन्होंने यह प्रण लिया था, कि अब वह किसी भी बच्चे को जांच के अभाव में मरने नहीं देगी और वह 1 दिन डॉक्टर बनेगी। आनंदी के इस फैसले में उनके पति गोपाल राव ने भरपूर सहयोग दिया था।

 विदेश जाने को लेकर हुआ था विरोध

भारत में उस दौर में एलोपैथिक डॉक्टरी की पढ़ाई नहीं होती थी, इसलिए पति ने उन्हें विदेश भेजने की तैयारी शुरू कर दी।
विदेश भेजने के फैसले को लेकर समाज और परिवार के लोग विरोध करने लगे थे,   समाज को यह कतई गवारा नहीं था कि एक शादीशुदा हिंदू औरत विदेश जाकर डॉक्टरी की पढ़ाई करें। समाज में बढ़ते विरोध को देखते हुए आनंदीबाई ने श्रीरामपुर कॉलेज में मेडिकल की डिग्री प्राप्त करने के मकसद को लोगों के मध्य खुल कर रखा।
  उन्होंने लोगों को बताया था कि विदेश जाकर सिर्फ डॉक्टर की शिक्षा नौकरी करने के लिए नहीं बल्कि लोगों की जान बचाना है , तब जाकर लोगों ने उन्हें सपोर्ट करने के साथ ही पैसों से भी सहयोग किया रूडी वाली परंपरा को तोड़ते हुए बड़ी मुश्किल से आनंदी विदेश पहुंची थी ।
लेकिन शुरुआत में आनंदी के लिए विदेश में रहना काफी मुश्किल हो रहा था क्योंकि भारत के अपेक्षा वाह की भाषा रहन-सहन और खान-पान सब कुछ ही अलग है, तब कॉलेज के डीन की पत्नी ने उनकी काफी मदद की थी।

 22 साल की उम्र में हुआ था निधन

ठंडे देश में धीरे-धीरे आनंदी की तबीयत खराब होने लगी थी और उन्हें टी.बी. हो गया था। फिर भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और अपनी पढ़ाई जारी रखें।  आनंदी ने पेंसिलवेनिया की वुमन मेडिकल कॉलेज से डॉक्टरी की पढ़ाई पूरी की और आनंदी को रानी विक्टोरिया ने उनकी पढ़ाई और काबिलियत को देखते हुए बधाई दी।   1886 के अंत में आनंदी, डॉक्टर आनंदी बनकर अपने देश भारत लौटी थी, जहां उनका भव्य तरीके से स्वागत किया गया था  । कोल्हापुर की रियासत ने उन्हें स्थानीय अल्बर्ट एडवर्ड अस्पताल में महिला वार्ड के चिकित्सक प्रभारी के रूप में नियुक्त किया था। लेकिन देश की पहली महिला डॉक्टर आनंदी की तबीयत लगातार बिगड़ती चली गई और उन्होंने महज 22 साल की उम्र में दुनिया को अलविदा कह दिया।

ऐसे में डॉक्टर आनंदी गोपाल जोशी की कहानी हमारे लिए प्रेरणादायक जिन्होंने रूढ़िवादी समाज को नकारते हुए, देश का नाम रोशन किया। साथ ही उनके जीवन पर कैरोलिन वेल्स ने 1888 में बायोग्राफी लिखि। इस बायोग्राफी पर एक सीरियल भी बना जिसका नाम था "आनंदी गोपाल", जिसका प्रसारण दूरदर्शन पर किया गया था  ।



किसी ने बड़े कमाल की बात कही है कि "100 साल की उम्र के लिए 100 साल जीना जरूरी नहीं, कुछ साल जी कर भी काम ऐसा कर जाओ कि दुनिया आपको 100 साल तक याद रखें", जिस प्रकार आनंदी में महज 22 साल की अपनी उम्र में ही अपना नाम रोशन कर दिया और भारत का नाम ऊंचा कर गई, जिसे आज आप और हम याद कर रहे हैं आज तक अपने दिल और धड़कनों में वह नाम जिंदा है। है अगर आपके पास जुनून तो आप भी कर सकते हैं  , है अगर आपका इरादा बुलंद तो आप भी कर सकते है ।  आपके पास भी वह शक्ति है जिसकी वजह से आप दुनिया को जीत सकते हैं बस कमी है तो एक चीज की " या तो आप करना नहीं चाहते हो या फिर आपका करने का इरादा नहीं है " इरादा अगर आपने मजबूत कर लिया तो परेशानियों की क्या औकात जो आपके सामने टिक सके ।


 तो दोस्तों लगे रहो,  डटे रहो, सीखते रहो और हमेशा आगे बढ़ते रहो ।
          THANKS FOR BEING WITH US
                 KLMD MOTIVATION

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