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Showing posts from August, 2020

बिहारक एक छोटे से गांव से उभरा बॉलीवुड का अनोखा सितारा

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बिहारक एक छोटे से गांव से उभरा बॉलीवुड का अनोखा सितारा   बॉलीवुड की चकाचोंध ने हमेशा ही अनगिनत कलाकारों को अपनी ओर खींचा है लेकिन सफलता उन्ही को मिली है जिन्होंने अपने अथक परिश्रम और दृढ़ विश्वास के साथ इस ओर कदम बढ़ाया है। आज भारतीय फ़िल्म जगत में तेजी से उभरते अभिनेता पंकज त्रिपाठी ने अपनी लगन और विश्वास के बल पर अपनी एक खास जगह बनाई है। बिहार के एक छोटे से गांव गोपालगंज से इस कलाकार ने अपना सफर शुरू किया।  बचपन से ही गांव में ये नाटक आदि में गहरी रुचि लिया करते थे।  इसलिए घर वालो की इच्छा के विरुद्ध अभिनय को ही अपना लक्ष्य बनाया। हालांकि इन्होंने पटना स्थित Food & craft Institute से डिप्लोमा लेकर दो साल तक पटना के ही मौर्य होटल में नोकरी भी की।  लेकिन वे अभिनय के अपने जुनून को रोक नही सके और दिल्ली के NSD से अभिनय की यात्रा पर निकल पड़े। शुरुआती दौर में NSD के अंग्रेजी माहौल में इन्हें काफी तकलीफे भी हुई, लेकिन अभिनय में अपनी कुशलता के चलते इन्होंने अपनी एक अलग पहचान बनाई। इसी दौरान साल 2004 में इन्हें अपनी पहली फ़िल्म "run" के लिए मौका मिला। जिसमे ...

बेटे के सुनहरे भविष्य के लिए पिता ने चलाई 105 किलोमीटर साईकल , छूटने नही दिया पेपर

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  बेटे के सुनहरे भविष्य के लिए पिता ने चलाई 105 किलोमीटर साईकल , छूटने नही दिया पेपर  हर पिता का एक ही सपना होता है की उसका बेटा सफलताओं के हर कीर्तिमान को छू ले। वह हर मुसीबत में  एक आसमान की भांति उसकी हर सम्भव मदद के लिए तत्पर रहता है । पिता का एक ऐसा ही स्नेह देखने को मिला है मध्यप्रदेश के धार जिले के गांव बयडीपूरा में जहाँ पर 38 वर्षीय एक गरीब-अनपढ़ पिता जिसका नाम शोभाराम है वह अपने बेटे को 10वी बोर्ड की परीक्षा दिलाने के लिए 105 किलोमीटर दूर परीक्षा केंद्र तक सायकल पर बिठाकर ले गया। परीक्षा के तीन-चार दिन पहले शुरू किया था सफर- शोभाराम नाम के इस व्यक्ति ने अपने बेटे की परीक्षा तिथि से एक दिन पहले सोमवार को  करीब तीन-चार दिन के खाने पीने के सामान के साथ अपना सफर शुरू किया। सही वक्त पर मंगलवार सुबह धार जिले शहर में स्थित भोजकन्या विद्यालय में बने परीक्षा केंद्र पर अपने बेटे को परीक्षा देने के लिए पहुचा दिया। *सायकल के अलावा नही था कोई और साधन*  कोरोना महामारी के वजह से यातायात बन्द होने की वजह से परीक्षा केंद्र पर पहुचने काफी मुश्किल ...

*पैरों से दिव्यांग इस बच्चे ने 10 किलोमीटर तक पैदल चलकर अस्पताल को जुटाए 9 करोड़ रुपये*।

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*पैरों से दिव्यांग इस बच्चे ने 10 किलोमीटर तक पैदल चलकर अस्पताल को जुटाए 9 करोड़ रुपये*। कोरोना के आने से दुनिया पूरी तरह बदल चुकी है यह एक ऐसी महामारी है जिसने पूरी दुनिया को गुटने टेकने पर मजबूर कर दिया। ऐसा कोई भी क्षेत्र नही है जो इससे नकारात्मक रूप से प्रभावित न हुआ हो। लेकिन इस समस्या के दौर में भी कुछ लोग ऐसे थे,  जिन्होंने हर सम्भव प्रयासों से जितना हो सके उतना मदद करने की पूरी कोशिश की। मदद की इस सृंखला मे इंग्लैंड का 5 साल एक पैरों से दिव्यांग बच्चा भी शामिल था। जिसने 10 किलोमीटर पैदल चलकर अस्पताल के लिए करीब 9 करोड़ रुपये की धन की जुटाई है। एक न्यूज ऐजेंसी के अनुसार इस बच्चे का नाम टोनी हड़गेल है। आपको बता दे टोनी के पैरों में पहले से ही दिक्कत थी, जिसकी वजह दे वह चल नही पाता था। लेकिन इसके बावजूद इस 5 साल के बच्चे को कृत्रिम अंग लगाए गए, जिसके बाद वह थोड़ा सा चलने लगा था। टोनी की इस हालत का जिम्मेदार कोई और नही बल्कि उसके खुद के बायोलॉजिकल माता-पिता है। मात्र 41 दिन के टोनी को उसके माता-पिता ने इतना प्रताड़ित किया की उसके दोनों पैर जख्मी हो गए। हालांकि टोनी के...

कोरोना कि इस महामारी के बीच आपके बच्चे क्या कर रहे है ???

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 5वीं कक्षा के इन दो बच्चों ने अमेरिका के MIT में हेकथौन अवार्ड 2020 जीतकर दुनिया मे किया भारत का नाम रोशन। कोरोना महामारी की वजह से बन्द पड़े स्कूलों की वजह से एक तरफ बच्चे घर पर पढ़ाई कर रहे है तो कुछ बच्चे मौज - मस्ती में लगे हुए है । लेकिन देश मे दो बच्चे ऐसे है  जिन्होंने दुनिया मे भारत का नाम रोशन किया। मुंबई के दो बच्चे जो कक्षा 5 के छात्र है इन्होंने अमेरिका के मेसाचुसेट्स इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (MIT) में 12 से 19 जुलाई के बीच आयोजत एप इंवेंटर हेकाथौन 2020 में अवार्ड जीतकर भारत का नाम पूरी दुनिया मे रोशन किया। इन दो बच्चों का नाम आयुष शंकरन (आयु 10 वर्ष)और जशीथ नारंग (आयु 9 वर्ष ) है। दोनों बच्चे मुंबई में ही कक्षा 5 की पढ़ाई कर रहे है । इन कारण मिला अवार्ड--  दोनों बच्चों ने जलवायु परिवर्तन पर एक मोबाइल एप विकसित किया जिसका शीर्षक 'climate Catastrophe - earth in dearth' है। इस एप प्रतिस्पर्धा में इन्होंने पहला और चौथा स्थान हांसिल किया। इस प्रतियोगिता में जलवायु परिवर्तन, बेहतर संसाधन आवंटन, स्वास्थ्य देखभाल , सीखने और दूर से काम करने , गर...

होंसला को पंख देकर 60 से 90 साल की दादियां स्कूल जाकर पढ़ाई कर रही है।

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होंसला को पंख देकर 60 से 90 साल की दादियां स्कूल जाकर पढ़ाई कर रही है।   शिक्षा मानव जीवन की वह विरासत है जिसे कोई किसी से छीन नही सकता है । यह वह धन है जिसे यदि आप किसी से सांझा करते है तो वह कम नही होता , बल्कि और बढ़ जाता है। शिक्षा प्राप्त करने की कोई उम्र नही होती है, इसे आप जब चाहे तब ग्रहण कर सकते है। आज के इस बढ़ते युग मे आपको कम से कम अपना नाम लिखना ओर पढ़ना तो आना ही चाहिए। पढ़ने लिखने के इस जुनून ने उम्र को दरकिनार करते हुए महाराष्ट्र के ठाणे जिले के फंगाने गांव में स्थित एक ऐसा खास स्कूल है जहाँ पर दादियां पढ़ती है। आपको जानकर यह हैरानी होगी कि इन दादियों की उम्र 60 से 90 वर्ष है। यह देश का ऐसा पहला स्कूल है जहाँ पर काफी ज्यादा उम्र की महिलाओं को पढ़ाने का काम किया जा रहा है। गजर में पोते पोतियों के साथ करती है पढ़ाई । स्कूल में से घर आने के बाद सभी दादियां अपने पोते - पोतियों के साथ पढ़ाई करती है। यह दोनों आपस मे एक-दूसरे को पढ़ाते है और साथ ही साथ कविताएं भी सुनाते है। पढ़ाई का यह वक्त एक-दूसरे को कुछ न कुछ सिखाने में गुजारा जाता है।  ऐसे आया स्कूल खोलने का वि...

बाई होने के बावजूद ऐसी दी अपनी आत्मा कथा को उड़ान

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बाई होने के बावजूद ऐसी दी अपनी आत्मा कथा को उड़ान    कहते है मुश्किल हर किसी की ज़िंदगी मे आती है , कोई बिखर जाता है तो कोई निखर जाता है। जिस दिन हमारे मन मे आसमान को छूने का होंसला, हिम्मत और आत्मविश्वास आ जायेगा, उस दिन खुद को रोकना मुश्किल ही नही नामुमकिन होगा। एक ऐसी ही शख्सियत है कश्मीर की "बेबी हलदर", जिन्होंने हर मुसीबतों से लड़कर अपना नाम बनाया। बेबी हलदर का जन्म 1973 में कश्मीर के एक आर्मी परिवार में हुआ था। शुरुआती दिनों में उनके पिता घर ख़र्च के लिए पैसे भेजते थे, लेकिन बाद में उन्होंने पैसे भेजना बन्द कर दिया। जिसकी  वजह से बेबी के परिवार को आर्थिक संकट का सामना करना पड़ा। सेना की नोकरी से रिटायर होने के बाद उनके पिता ने घर आना ही छोड़ दिया, जिसके बाद उनकी मां काफी ज्यादा दुखी रहने लगी और ज़िन्दगी से थक हार कर एक दिन उनकी माँ भी उन्हें छोड़ कर चली गयी। जिसके बाद उनके पिता ने दूसरी शादी कर ली, उस दौरान कभी बेबी हलदर कभी अपनी नई मां, बड़ी बहन के ससुराल और कभी सपनी बुआ के यहाँ रहकर अपना गुज़ारा करती। और इस दरमियान मन ही मन अपनी माँ को याद करती। लेकिन तमाम कठिनाइय...

गुलाबो सपेरा की कहानी सुनकर जोश से भर जाओगे

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गुलाबो सपेरा की जीवन पढ़कर अंदर से कुछ करने को होगा। जन्म लेते ही जिसे जमीन में दफना दिया था, उसी ने दिलाई राजस्थान को नई पहचान। जाको राखे, साईया मार सके न कोई"  ये कहावत आपने जीवन मे कई बार सुनी होगी, लेकिन इसी कहावत को सच कर दिखाया राजस्थान की गुलाबो सपेरा ने। राजस्थान की आन , बान और शान को उन्होंने कालबेलिया डांस की बदौलत अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक नई पहचान दिलाई। गुलाबो सपेरा का जन्म राजस्थान के अजमेर में सपेरा समुदाय में हुआ था, उनके पिता पुजारी होने के साथ ही आने परिवार का खर्च चलाने के लिए लोगो को सांपो का खेल दिखाया करते थे। गुलाबो के बचपन की कहानी काफी दुःख से भरी पड़ी थी, जब उनकी माँ को प्रसव पीड़ा होना शुरू हुई तो उस वक्त उनके पति साथ नही थे। वो सांपो का खेल दिखाने के लिए शहर गए हुए थे। तब गांव की औरतों ने कैसे भी करके डिलीवरी करवाई, लेकिन जब उनको पता चला कि लड़का नही, लड़की ने जन्म लिया है तो  गांव के लोग नवजात बच्ची को मारने के लिए पीछे पड़ गए, क्योकि उस जमाने मे लड़की पैदा होना किसी गुनाह से कम नही था। गुलाबो अपने माता-पिता की सातवी सन्तान थी, इसलिए कुछ औरतों ने ...

शूटर दादी

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घूंघट की आड़ में शूटर दादी ने साधा निशाना बॉलीवुड तक बनाई अपनी पहचान  60 साल के बाद जहाँ लोग आराम करते है, वही यूपी की शूटर दादी ने अपनी ज़िंदगी की नई शुरुआत रूढ़िवादी परम्परा को तोड़ते हुए अपने लिए जीना शुरू किया और अपने निशाने बाजी से देशभर में लहराया। शूटर दादी उत्तरप्रदेश के बागपत से ताल्लुक रखती है, उनका जन्म 1 जनवरी 1932 को हुआ था। लगभग 16 साल की उम्र जोहड़ी के किसान भंवर सिंह से उनकी शादी हो गई थी। जिसके बाद अन्य गृहणियों की तरह उन्होंने भी ज़िन्दगी को अपने परिवार की देखभाल और घर के काम काज में झोंक दिया, वो रोजाना खाना बनाने, बर्तन और कपड़े साफ करने से लेकर जानवरो की देखभाल की तरह हर काम को पूरी ईमानदारी के साथ करती थी। शुरुआत के दिनों में धीरे-धीरे घर के कामो में वक्त का पहिया गुमता गया, और वो मां बन गई। मां बनने के साथ ही उन पर पहले से भी ज्यादा जिम्मेदारियों का बोझ आ गया।  उन्होंने एक के बाद एक अपने बच्चों की शादी कर दी, इन सब मे उनकी उम्र भी ढलती चली गई और देखते ही देखते वह बूढ़ी होती चली गई। समय के इसी चक्र में वो बहु दे दादी कब बन गई वक्त का पता ही नही चला,...

मात्र 250 रुपये से 150 करोड़ का सफर

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बिहार के अमित दास ने तय किया है ₹ 250 से लेकर डेढ़ सौ करोड़ तक का सफर  संसाधन होने के बावजूद भी अपनी जिद्द और मेहनत के कारण कुछ लोग अपने सपनों को साकार कर ही लेते हैं  ऐसे ही शख्सियत है बिहार के अमित कुमार दास जिन्होंने अपनी मेहनत के दम पर 250 रुपये से लेकर डेढ़ सौ करोड़ तक का सफर तय किया । अमित कुमार दास का जन्म बिहार के अररिया जिले के  फारबिसगंज कस्बे के एक किसान के घर पर हुआ था  उनके परिवार में लड़के ज्यादातर बड़े होकर खेती-बाड़ी ही किया करते थे,  परंतु वह इस परंपरा को आगे नहीं बढ़ाना चाहते थे, वह बचपन से ही इंजीनियर बनने का सपना मन ही मन संजोए रहे थे  परंतु समस्या यह थी कि परिवार की आर्थिक स्थिति सही नहीं होने के कारण वह पढ़ाई नहीं कर पाए। परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर होने के बावजूद भी जैसे तैसे करके उन्होंने स्कूली शिक्षा प्राप्त करने के बाद उन्होंने  पटना के ए एन कॉलेज से साइंस से इंटर किया। 12वी कक्षा पूरी करने के बाद अमित समझ नहीं पा रहे थे कि इंजीनियर बनने का सपना पूरा कैसे करें ?  लेकिन उन्होंने मन में आगे बढ़ने का निश्चय ...
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     कभी ठेले पर बेचती थी चाय और चमोसे, मेहनत ने                        बनाया करोड़ो की मालकिन   कहते है कि कोई भी व्यक्ति अपनी मेहनत और संघर्ष से अपनी मंजिल को हाँसिल कर ही लेता है, एक ऐसी ही शख्सियत है तमिलनाडु की पेट्रोशिया नारायण जिन्होंने ज़िन्दगी में कभी हार नही मानी और 50 रुपये से शुरू करके करोड़ों तक पहुची। पैट्रिशिया नारायण का जन्म तमिलनाडु में हुआ था और वो एक साधारण परिवार से ताल्लुक रखती थी। पैट्रिशिया नारायण को कॉलेज में पढ़ाई करने के दौरान उन्हें एक लड़की से प्यार हो गया था, जिसके बाद उन्होंने आने परिवार के खिलाफ जाकर लव मैरिज कर ली थी। जिसकी वजह से दोनों के माता-पिता ने उनसे नाता तोड़ लिया था। कुछ समय तक पैट्रिशिया नारायण ओर उनके पति के साथ सबकुछ सही रहा था, लेकिन धीरे-धीरे उनके बीच का प्यार झगड़े में बदल गया। पैट्रिशिया नारायण का पति ड्रग एडिक्ट था और अपनी पत्नी पर अत्याचार करता था। पैट्रिशिया नारायण ने अपने पति के तमाम अत्याचारों को सहती रही और उन्होंने ऐसे में ही दो बच्चों को जन्म दिया था...

सफलता सिर्फ और सिर्फ हौसले और मेहनत की मोहताज है

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      सफलता सिर्फ और सिर्फ हौसले और मेहनत की                                     मोहताज है कहते है कि लोग अपनी तकदीर अपने हाथों से लिखते है और अपने हाथों की लकीरों पर विश्वास भी करते है उनका विश्वास होता है की उनकी किस्मत एक न एक दिन जरूर बदल जाएगी।  लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जिनके हाथ नही जोते है उनकी किस्मत कौन लिखता है, क्योकि उनके न तो हाथ है और न ही हाथों की लकीर। आज हम एक ऐसी लड़की के बारे में बताने जा रहे है जिसके दोनों हाथ नही है । फिर भी वह अपनी किस्मत इतनी अच्छी तरह से लिखती है कि देखने वाले भी सोच में पड़ जाते है।  रायपुर की दामिनी सेन अपनी किस्मत की लकीरें अपने पैरों से उकेर रही है और इतनी सुंदरता है उकेर रही है कि दो हाथ वाले इंसान भी देखकर चकित हो जाते  है। पैरों से करती है पढ़ाई छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के वीरगांव की रहने वाली दामिनी सेन का जन्म से ही हाथ नही है। लेकिन दामिनी ने इसे कभी भी अपनी कमजोरी नही बनने दिया, दामिनी ने हाथों की ...

Every lady is a gentle woman besides man too

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 बिहार की किसान चाची ने जैविक खेती से किया देश का नाम रोशन अपनी कर्मठता और कौशलता के दम पर मुज़्ज़फ़रपुर की राजकुमारी देवी ने साबित कर दिया कि महिलाएं किसी भी काम मे पुरुषों से कम नही है। साधारण सी दिखने वाली इस महिला ने कुछ ऐसा कर दिखाया,  जिसकी किसी ने कल्पना तक नही की होगी। समाज को बदलने का लिया संकल्प राजकुमारी देवी यानी किसान चाची का जन्म बिहार के मुज़्ज़फ़रपुर जिले के सरैया में हुआ था। राजकुमारी देवी गरीब परिवार से ताल्लुक रखती थी, जिसकी वजह से कक्षा 10वी तक कि पढ़ाई पूरी करने के बाद उनके परिवार ने शादी करवा दी थी। राजकुमारी देवी के पति भी किसान थे, लेकिन उस समय उनके गांव व आसपास के गांवों में केवल गांजा और तम्बाकू की खेती हुआ करती थी लेकिन ऐसे में परिवार का खर्च चलाना काफी मुश्किल हुआ करता था ।  घर का खर्च सही तरीके से न होने के कारण परिवार में झगड़े हुआ करते थे। शादी के 9 साल भी राजकुमारी की गोद सुनी थी। जिसकी वजह से उन्हें परिवार और समाज के अत्यचार व ताने सुनने व झेलने  पड़ते थे। इसके अलावा महिलाओं के साथ होने वाले अत्याचार को देख कर दुखी हो जाती थी। तब ...

Inspiration life story of TIJANBAI

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इतनी परेशानी के बावजूद भी महिला बिना शिक्षा के आगे बढ़ सकती है हम क्यो नही। छत्तीसगढ़ की लोक कला "पंडवानी" को दिलाई देश-विदेश में दिलाई एक नई पहचान। जीवन के किसी भी क्षेत्र में सफलता का मूल मंत्र व्यक्ति का अटूट विश्वास और दृढ़ इच्छाशक्ति होता है, ऐसे में छत्तीसगढ़ी तीजन बाई  एक ऐसी शख्सियत थे जिन्होंने  अपनी काबिलियत के बल पर पंडवानी संस्कृति को विदेश में पहचान दिलाई। तेजन बाई ने नही देखा स्कूल का दरवाजा  तीजन बाई का जन्म छत्तीसगढ़ के भिलाई के गनियारी गांव में हुआ था। तीजन बाई अपने माता - पिता की पांच सन्तानो में सबसे बड़ी थी। उनके घर की आर्थिक स्थिति अच्छी नही थी। तीजन बाई जिस समुदाय में पैसा हुई थी, उनका मुख्य पेशा चिड़िया पकड़ना, शहद बटोरना,  चटाइयां और झाड़ू बनाना था। उस समय लड़कियों की शिक्षा पर पाबंदी लगाई गई थी। ऐसे में तीजन बाई कभी स्कूल का दरवाजा भी नही देख पाई थी, तीजन बाई अपने बचपन से ही अपने नाना ब्रजलाल महाभारत की कहानियां गाते सुनाते देखती। तीजन ने जब पहली बार छुप छूप कर अपने नाना से  द्रोपदी चिर हरण का प्रसंग सुनाया ,  जिसे सुन...

Inspiration life story of Dr. APJ Abdul Kalam ji

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डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम जी के जीवन का यह सार हमको भी हमारे जीवन मे उतारना चाहिए। भारत के पूर्व राष्ट्रपति और ' मिसाईल मैन ' के नाम से प्रसिद्ध डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम ने 27 जुलाई 2015 को दुनिया को अलविदा कह दिया था।  तो आज अपन जानते है उनके जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातें , जो हमको बहुत सिख देती है। घर - घर जाकर बेचना पड़ा था अखबार डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम जी का जन्म  15 अक्टूबर 1931 को तमिलनाडु के रामेश्वरम में हुआ था, उनके पिता मछुआरों को अपनी नाव किराए पर लेकर अपने घर का खर्च लाते थे। ऐसे में अपनी शुरुआती शिक्षा पूरी करने के लिए घर घर जाकर अखबार बेचने का कार्य करते थे। डॉ एपीजे अब्दुल कलाम बचपन से ही पढ़ाई में तेज और तरार थे।और उनका गणित पढ़ने में काफी मन लगता था। इसलिए मात्र 8 साल की उम्र से ही सुबह 4:00 बजे उठकर और नहाकर गणित की पढ़ाई करने चले जाते थे। वैसे तो सुबह-सुबह बच्चों को नहाना बहुत बड़ी चीज होती है, परंतु उनके नहाने के पीछे भी एक कारण था ।उनके गणित के टीचर फ्री में पढ़ाते थे,  और उन्हीं बच्चों को पढ़ाते थे नहाकर आते थे। पक्षियों को उड़ता देख जीवन पर पड़ा गहर...