गुलाबो सपेरा की कहानी सुनकर जोश से भर जाओगे
गुलाबो सपेरा की जीवन पढ़कर अंदर से कुछ करने को होगा।
जन्म लेते ही जिसे जमीन में दफना दिया था, उसी ने दिलाई राजस्थान को नई पहचान।
जाको राखे, साईया मार सके न कोई" ये कहावत आपने जीवन मे कई बार सुनी होगी, लेकिन इसी कहावत को सच कर दिखाया राजस्थान की गुलाबो सपेरा ने।
राजस्थान की आन , बान और शान को उन्होंने कालबेलिया डांस की बदौलत अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक नई पहचान दिलाई।
गुलाबो सपेरा का जन्म राजस्थान के अजमेर में सपेरा समुदाय में हुआ था, उनके पिता पुजारी होने के साथ ही आने परिवार का खर्च चलाने के लिए लोगो को सांपो का खेल दिखाया करते थे। गुलाबो के बचपन की कहानी काफी दुःख से भरी पड़ी थी, जब उनकी माँ को प्रसव पीड़ा होना शुरू हुई तो उस वक्त उनके पति साथ नही थे। वो सांपो का खेल दिखाने के लिए शहर गए हुए थे। तब गांव की औरतों ने कैसे भी करके डिलीवरी करवाई, लेकिन जब उनको पता चला कि लड़का नही, लड़की ने जन्म लिया है तो गांव के लोग नवजात बच्ची को मारने के लिए पीछे पड़ गए, क्योकि उस जमाने मे लड़की पैदा होना किसी गुनाह से कम नही था। गुलाबो अपने माता-पिता की सातवी सन्तान थी, इसलिए कुछ औरतों ने मिलकर नवजात गुलाबो सपेरा को रेत में दफना दिया।
लेकिन भगवान को कुछ और ही मंजूर था और गुलाबो की मौसी ने देर रात बहुत हिम्मत करके उन्हें जमीन से खोदकर बाहर निकाला और नया जीवन दिया।
गुलाबो सपेरा के पिता अपनी बच्ची से बहुत प्यार करते थे और उन्हें यह चिंता अंदर ही अंदर खाये जा रही थी कि कहि फिर लोग मेरी बच्ची को मारने की कोशिश न करे। इसलिए सांपो का खेल दिखाने जहाँ भी जाया करते वो अपनी बच्ची को साथ ले जाया करते। गुलाबो का बचपन बहुत गरीबी में गुजरा, उन्होंने अपनी ज़िंदगी मे कभी स्कूल का मुंह तक नही देखा। गुलाबो छोटी उम्र से ही सांपो के साथ नाचने लगी थी। बिन, पुंगी और डफली की धुन पर उसका शरीर स्वतः ही थिरकने लगता था। गुलाबो सपेरा को बचपन से ही उनके समाज वाले ताने मारते, गन्दी गालियां निकालते और समाज से बाहर निकालने की धमकी भी देते, ऐसे में लोगो के लिए गुलाबो बोझ बन चुकी थी। लेकिन उनके पिता अपनी बच्ची का साथ कभी नही छोड़ते थे। फिर लगातार समाज की प्रताड़ना झेलते हुए गुलाबो बड़ी होती चली गई और बड़े होने के साथ ही उन्होंने राजस्थान का लोकनृत्य कालबेलिया डांस करना शुरु कर दिया। लेकिन जब सड़को पर सांपो को शरीर पर लपेटकर नाचती तो उनके समाज के लोगो को पसंद नही आता, कहते यह समाज के नाम पर कलंक है और उनका बाहर निकलना बंद करवा दिया लेकिन उन्हें हार मानना भी मंजूर नही था।
गुलाबो का अजमेर में अब डांस करना आसान नही था, इसलिए वो अपने भाई के साथ अजमेर से जयपुर आ गयी। जयपुर आने के बाद उन्होंने कई कार्यक्रमों में भाग लिया और बेहतरीन प्रस्तुति दी। इसके बाद जब 10 साल की आयु में गुलाबो पुष्कर मेले में डांस कर रही थी, तब वहाँ पर राजस्थान सरकार के अधिकारी तृप्ति पांडे और हिम्मत सिंह ने उनका डांस देखा। उन्होंने देखा कि मेले में सपेरे सांपो को नचा रहे थे, उन्ही सांपो के बीच गुलाबो कालबेलिया नृत्य कर रही थी, उनके शरीर के लचीलेपन को देखते ही बनता था। डांस खत्म होने के बाद अधिकारी तृप्ति गुलाबो के पिता से बोली आपकी बेटी का स्थान सड़को पर नही मंच पर है। इसके बाद उन्होंने दिल्ली में आयोजित एक कार्यक्रम में भाग लिया, जहाँ गुलाबो ने पहली बार मंच पर अपनी कला का प्रदर्शन किया।
1985 में वाशिंगटन में फेस्टिवल ऑफ इंडिया के नाम से एक कार्यक्रम आयोजित किया जा रहा था और इसी वक्त 14 वर्ष की उम्र में गुलाबो को इंटरनेशनल लेवल प्रस्तुति देने का मौका मिला, लेकिन कहते है न कि सफलता इतनी आसानी से अपने कदमो को नही चूमती है। ठीक उस तरह शो के एक दिन पहले ही गुलाबो सपेरा के पिता का निधन हो गया, इस खबर को सुनने के बाद वो पूरी तरह टूट गयी, क्योकि बचपन से ही वो अपने पिता के बहुत करीब थी। ऐसे में अगले दिन विदेश जाने का फैसला लेना बहुत कठिन था, लेकिन उन्होंने खुद को पहले शांत किया और सोच जिस समाज से उनके पिता अपनी बच्ची को बचपन से ही बचाते आये है , अब उनका सपना पूरा करने का सही समय आ गया है। क्योकि उनके पिता को उम्मीद थी कि गुलाबो एक दिन कुछ न कुछ अलग जरूर करेगी और देश का नाम रोशन करेगी। इसीलिए गुलाबो ने अपने परिवार को समजाया और अपने कदमों को आगे बढ़ाया और वाशिंगटन पहुँचकर घूंघट से अपने आंसुओ को छिपाए गुलाबो ने थिरकना शुरू कर दिया।
गुलाबो को "बिग-बॉस 5" में जाने का मौका मिला तो लोगो ने कहा- वहां जाकर क्या करेगी लोग उनका मजाक उड़ाने लगे। लेकिन गुलाबो ने लोगो की बातों को अनसुनी कर दी और बिग-बॉस के घर जा पहुची, वहाँ पहुँचकर भी उन्होंने अपने डांस की प्रस्तुति दी जिससे जनता ने खूब पसंद किया । इसके बाद गुलाबो को बॉलीवुड फ़िल्म बटवारा, क्षत्रिय, अजूबा में काम करने का मौका मिला। गुलाबो ने यह डांस कभी सीखा नही था, बल्कि बचपन से ही बिन की आवाज सुनकर डांस करना शुरू कर देती थी
गुलाबो को कालबेलिया डांस की नई पहचान दिलाने के लिए साल 2016 में पद्मश्री अवार्ड से सम्मानित किया गया।
अपनी मेहनत और हुनर के दम पर गुलाबो सपेरा ने दिखा दिया कि किसी भी काम को निश्चय के साथ किया जाए तो कुछ भी नामुमकिन नही, ऐसे में कह सकते है कि जिस बच्ची को उनके समाज वालो ने मरने के लिए छोड़ दिया था। उसी ने अपनी काबिलियत के दम पर पूरे राजस्थान का नाम रोशन किया।
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जन्म लेते ही जिसे जमीन में दफना दिया था, उसी ने दिलाई राजस्थान को नई पहचान।
जाको राखे, साईया मार सके न कोई" ये कहावत आपने जीवन मे कई बार सुनी होगी, लेकिन इसी कहावत को सच कर दिखाया राजस्थान की गुलाबो सपेरा ने।
राजस्थान की आन , बान और शान को उन्होंने कालबेलिया डांस की बदौलत अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक नई पहचान दिलाई।
गुलाबो सपेरा का जन्म राजस्थान के अजमेर में सपेरा समुदाय में हुआ था, उनके पिता पुजारी होने के साथ ही आने परिवार का खर्च चलाने के लिए लोगो को सांपो का खेल दिखाया करते थे। गुलाबो के बचपन की कहानी काफी दुःख से भरी पड़ी थी, जब उनकी माँ को प्रसव पीड़ा होना शुरू हुई तो उस वक्त उनके पति साथ नही थे। वो सांपो का खेल दिखाने के लिए शहर गए हुए थे। तब गांव की औरतों ने कैसे भी करके डिलीवरी करवाई, लेकिन जब उनको पता चला कि लड़का नही, लड़की ने जन्म लिया है तो गांव के लोग नवजात बच्ची को मारने के लिए पीछे पड़ गए, क्योकि उस जमाने मे लड़की पैदा होना किसी गुनाह से कम नही था। गुलाबो अपने माता-पिता की सातवी सन्तान थी, इसलिए कुछ औरतों ने मिलकर नवजात गुलाबो सपेरा को रेत में दफना दिया।
लेकिन भगवान को कुछ और ही मंजूर था और गुलाबो की मौसी ने देर रात बहुत हिम्मत करके उन्हें जमीन से खोदकर बाहर निकाला और नया जीवन दिया।
गुलाबो सपेरा के पिता अपनी बच्ची से बहुत प्यार करते थे और उन्हें यह चिंता अंदर ही अंदर खाये जा रही थी कि कहि फिर लोग मेरी बच्ची को मारने की कोशिश न करे। इसलिए सांपो का खेल दिखाने जहाँ भी जाया करते वो अपनी बच्ची को साथ ले जाया करते। गुलाबो का बचपन बहुत गरीबी में गुजरा, उन्होंने अपनी ज़िंदगी मे कभी स्कूल का मुंह तक नही देखा। गुलाबो छोटी उम्र से ही सांपो के साथ नाचने लगी थी। बिन, पुंगी और डफली की धुन पर उसका शरीर स्वतः ही थिरकने लगता था। गुलाबो सपेरा को बचपन से ही उनके समाज वाले ताने मारते, गन्दी गालियां निकालते और समाज से बाहर निकालने की धमकी भी देते, ऐसे में लोगो के लिए गुलाबो बोझ बन चुकी थी। लेकिन उनके पिता अपनी बच्ची का साथ कभी नही छोड़ते थे। फिर लगातार समाज की प्रताड़ना झेलते हुए गुलाबो बड़ी होती चली गई और बड़े होने के साथ ही उन्होंने राजस्थान का लोकनृत्य कालबेलिया डांस करना शुरु कर दिया। लेकिन जब सड़को पर सांपो को शरीर पर लपेटकर नाचती तो उनके समाज के लोगो को पसंद नही आता, कहते यह समाज के नाम पर कलंक है और उनका बाहर निकलना बंद करवा दिया लेकिन उन्हें हार मानना भी मंजूर नही था।
गुलाबो का अजमेर में अब डांस करना आसान नही था, इसलिए वो अपने भाई के साथ अजमेर से जयपुर आ गयी। जयपुर आने के बाद उन्होंने कई कार्यक्रमों में भाग लिया और बेहतरीन प्रस्तुति दी। इसके बाद जब 10 साल की आयु में गुलाबो पुष्कर मेले में डांस कर रही थी, तब वहाँ पर राजस्थान सरकार के अधिकारी तृप्ति पांडे और हिम्मत सिंह ने उनका डांस देखा। उन्होंने देखा कि मेले में सपेरे सांपो को नचा रहे थे, उन्ही सांपो के बीच गुलाबो कालबेलिया नृत्य कर रही थी, उनके शरीर के लचीलेपन को देखते ही बनता था। डांस खत्म होने के बाद अधिकारी तृप्ति गुलाबो के पिता से बोली आपकी बेटी का स्थान सड़को पर नही मंच पर है। इसके बाद उन्होंने दिल्ली में आयोजित एक कार्यक्रम में भाग लिया, जहाँ गुलाबो ने पहली बार मंच पर अपनी कला का प्रदर्शन किया।
1985 में वाशिंगटन में फेस्टिवल ऑफ इंडिया के नाम से एक कार्यक्रम आयोजित किया जा रहा था और इसी वक्त 14 वर्ष की उम्र में गुलाबो को इंटरनेशनल लेवल प्रस्तुति देने का मौका मिला, लेकिन कहते है न कि सफलता इतनी आसानी से अपने कदमो को नही चूमती है। ठीक उस तरह शो के एक दिन पहले ही गुलाबो सपेरा के पिता का निधन हो गया, इस खबर को सुनने के बाद वो पूरी तरह टूट गयी, क्योकि बचपन से ही वो अपने पिता के बहुत करीब थी। ऐसे में अगले दिन विदेश जाने का फैसला लेना बहुत कठिन था, लेकिन उन्होंने खुद को पहले शांत किया और सोच जिस समाज से उनके पिता अपनी बच्ची को बचपन से ही बचाते आये है , अब उनका सपना पूरा करने का सही समय आ गया है। क्योकि उनके पिता को उम्मीद थी कि गुलाबो एक दिन कुछ न कुछ अलग जरूर करेगी और देश का नाम रोशन करेगी। इसीलिए गुलाबो ने अपने परिवार को समजाया और अपने कदमों को आगे बढ़ाया और वाशिंगटन पहुँचकर घूंघट से अपने आंसुओ को छिपाए गुलाबो ने थिरकना शुरू कर दिया।
गुलाबो को "बिग-बॉस 5" में जाने का मौका मिला तो लोगो ने कहा- वहां जाकर क्या करेगी लोग उनका मजाक उड़ाने लगे। लेकिन गुलाबो ने लोगो की बातों को अनसुनी कर दी और बिग-बॉस के घर जा पहुची, वहाँ पहुँचकर भी उन्होंने अपने डांस की प्रस्तुति दी जिससे जनता ने खूब पसंद किया । इसके बाद गुलाबो को बॉलीवुड फ़िल्म बटवारा, क्षत्रिय, अजूबा में काम करने का मौका मिला। गुलाबो ने यह डांस कभी सीखा नही था, बल्कि बचपन से ही बिन की आवाज सुनकर डांस करना शुरू कर देती थी
गुलाबो को कालबेलिया डांस की नई पहचान दिलाने के लिए साल 2016 में पद्मश्री अवार्ड से सम्मानित किया गया।
अपनी मेहनत और हुनर के दम पर गुलाबो सपेरा ने दिखा दिया कि किसी भी काम को निश्चय के साथ किया जाए तो कुछ भी नामुमकिन नही, ऐसे में कह सकते है कि जिस बच्ची को उनके समाज वालो ने मरने के लिए छोड़ दिया था। उसी ने अपनी काबिलियत के दम पर पूरे राजस्थान का नाम रोशन किया।
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